जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है — क्या हम वास्तव में घटनाओं को उनकी सच्चाई में देख रहे थे, या फिर हमारी नज़रें सिर्फ उस हिस्से पर टिक गई थीं जो हमारी सोच और पसंद से मेल खाता था? सामाजिक आंदोलनों में अक्सर यही होता है कि वास्तविकता और धारणा के बीच की दूरी बहुत बड़ी हो जाती है। मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया पोस्ट और व्यक्तिगत अनुभव — ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जो कभी-कभी अधूरी होती है। कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक आवाज़ मानते हैं, जबकि अन्य इसे राजनीतिक एजेंडा से प्रेरित मानते हैं। असल सवाल यह है कि क्या हम घटनाओं को देखने के बजाय उन्हें अपनी मान्यताओं के चश्मे से फ़िल्टर कर रहे हैं।