लघुकथा-------ख़ास वजह (विजय कुमार)

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शमीम भाई ऑफ़िस में नए क्लर्क को देख कर थोड़ा घबराए, पता नहीं कैसा आदमी होगा। पुराने क्लर्क सिन्हा जी से तो उनकी अच्छी जान पहचान हो गई थी।अपना हर काम पैसे से करवा लेते थे।अपने आप से बातें करते आगे बढ़ रहे थे--पता नहीं किस मूड का है? रिश्वत लेगा भी या नहीं। ये तो नामुमकिन है कि आज के दौर में कोई रिश्वत न ले पर कितना लेगा? थोड़ा ज़्यादा--या बहुत से बहुत---। कुछ और सोचने का मौक़ा ही न मिला। सामने क्लर्क का टेबुल था। शमीम भाई बड़े अदब से बोले--"आदाब अर्ज़ करता हूँ भाई जान।" "आदाब!बैठिए ।" क्लर्क ने फ़ाइल बंद करते हुए कहा। "जी शुक्रिया। भाई जान, लगता है सिन्हा जी की जगह आप ही आए हैं " "जी हाँ " "ख़ैर, हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है। जैसे वो वैसे आप।" खुशामदी अंदाज़ में बोले। " हाँ, वो तो है।""भाई जान, मेरी एक फ़ाइल आपके----" "देख लेंगे। पर क्या है कि---।" "मैं जानता हूँ हुज़ूर।" कहते हुए शमीम भाई ने टेबुल के नीचे से दो हज़ार रुपए बढ़ा दिया। क्लर्क ने उन्हें आश्चर्य से देखा। फिर बोला--"यह क्या ? सिर्फ़ दो हज़ार?" "भाई जान, सिन्हा जी को तो मैं इतना ही दिया करता था।" "पर मैं इस काम के पांच हज़ार लूंगा।" "पांच हज़ार!" शमीम भाई के तो होश उड़ गए। " लेकिन हुज़ूर ये तो बहुत ज़्यादा है। कोई ख़ास वजह! ""वजह सिर्फ़ इतनी है कि सिन्हा जी ने यह कुर्सी पांच लाख देकर पायी थी और मैंने इसे दस लाख में पायी है।" शमीम भाई इस तर्क से सहमत हो गए। उन्हें पांच हज़ार दे दिया।

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