वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रतियोगिता शासन और मानकों पर केंद्रित है, जिसमें शीर्ष 500 AI सुपरकंप्यूटरों में से 75% पर अमेरिका और 15% पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका निर्यात नियंत्रण और पैक्स सिलिका जैसे गठबंधनों का उपयोग करता है, जबकि चीन ग्लोबल साउथ के नियमों को आकार देने के लिये विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग संगठन (WAICO) (भारत को छोड़कर 29 देशों द्वारा हस्ताक्षरित) का लाभ उठाता है। यूरोप यूरोपीय संघ AI अधिनियम, 2024 के माध्यम से प्रभाव डालता है। भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखकर अपनी AI सॉवरेनिटी को सुरक्षित करने की आवश्यकता है— डेटा, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना और संवेदनशील सार्वजनिक प्रणालियों को भारतीय अधिकार क्षेत्र एवं घरेलू विधिक ढाँचे के अंतर्गत रखना आवश्यक होगा, न कि प्रत्येक वस्तु का घरेलू स्तर पर विनिर्माण करना। भारत के रणनीतिक विकास के लिये संप्रभु कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्यों आवश्यक है? डेटा सॉवरेनिटी और सांस्कृतिक संदर्भ: पश्चिमी या विदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) मुख्य रूप से यूरोसेंट्रिक डेटासेट पर प्रशिक्षित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारत की समृद्ध विविध भाषायी, सांस्कृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं का इन मॉडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता। संप्रभु AI यह सुनिश्चित करता है कि डेटा गवर्नेंस घरेलू कानूनों जैसे कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 जैसे घरेलू विधिक प्रावधानों के अनुरूप हो। यह स्वदेशी मॉडलों को स्थानीय संदर्भों का सटीक रूप से प्रसंस्करण करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिये, IndiaAI मिशन जैसी पहलें स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों से 20 स्वदेशी संप्रभु मॉडल प्रस्तावों (जिनमें 12 LLM और 8 स्मॉल लैंग्वेज मॉडल शामिल हैं) को सक्रिय रूप से समर्थन प्रदान कर रही हैं, जो जटिल क्षेत्रीय बारीकियों का प्रबंधन करने में सक्षम हैं, जिन्हें सामान्य मॉडल अनदेखा कर देते हैं। आर्थिक उत्थान और GDP अनुमान: घरेलू AI क्षमताओं के बिना, स्वचालन और तकनीकी सेवाओं द्वारा उत्पन्न आर्थिक मूल्य देश से बाहर चला जाता है, जिससे स्थानीय उद्यम विदेशी सॉफ्टवेयर के मात्र किरायेदार बनकर रह जाते हैं। प्रमुख उद्योगों में घरेलू AI को एकीकृत करने से उच्च मूल्य वाली बौद्धिक संपदा

ा निर्माण होता है, जिससे देश का 300 अरब डॉलर का IT क्षेत्र श्रम-प्रधान सेवा मॉडल से IP-आधारित उत्पाद अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो जाता है। PwC और NITI आयोग के व्यापक अनुमानों के अनुसार, AI को व्यापक रूप से अपनाने से वर्ष 2035 तक भारत की GDP में 550 बिलियन डॉलर से 607 बिलियन डॉलर का योगदान होने का अनुमान है, जिसका संचयी दीर्घकालिक प्रभाव संभावित रूप से 1.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है। किफायती कंप्यूटिंग अवसंरचना का लोकतंत्रीकरण: उच्च-स्तरीय ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) पर वैश्विक तकनीकी दिग्गजों का अत्यधिक नियंत्रण है, जिसके कारण घरेलू सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) और प्रारंभिक चरण के नवप्रवर्तक इनकी उपलब्धता एवं खरीद से वंचित रह जाते हैं। राज्य समर्थित संप्रभु कंप्यूटिंग अवसंरचना संसाधनों की कमी को पूरा करती है, कंप्यूटिंग को एक सार्वजनिक उपयोगिता के रूप में मानते हुए ज़मीनी स्तर पर नवाचार को बढ़ावा देती है। IndiaAI मिशन के तहत, 38,000 से अधिक उच्च-स्तरीय GPU को एक केंद्रीकृत पोर्टल पर शामिल किया गया है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्टार्टअप और शोधकर्त्ताओं के लिये इन्हें लगभग ₹65 प्रति घंटे की रियायती दर पर उपलब्ध कराया गया है (जो वैश्विक बाज़ार दरों का लगभग एक तिहाई है)। राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना संरक्षण: रक्षा, साइबर सुरक्षा, बिजली ग्रिड और वित्तीय नेटवर्क के लिये विदेशी ब्लैक-बॉक्स AI प्रणालियों पर निर्भर रहने से गंभीर प्रणालीगत कमज़ोरियाँ तथा संभावित विदेशी निगरानी जोखिम उत्पन्न होते हैं। राष्ट्रीय ढाँचे के अंतर्गत समर्पित नेक्स्ट जेनरेशन के प्रोसेसरों से युक्त एक सुरक्षित राष्ट्रीय GPU क्लस्टर की तैनाती यह सुनिश्चित करती है कि संवेदनशील प्रशासनिक, स्वास्थ्य देखभाल और सामरिक डेटा पूरी तरह से राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर ही रहे। समावेशी सार्वजनिक सेवा वितरण को सशक्त बनाना: सॉवरेन AI को भारत की सुदृढ़ डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)— जैसे आधार और UPI के साथ एकीकृत करने से सरकार को कल्याणकारी सेवाओं के वितरण को अति-व्यक्तिगत बनाने में सहायता मिलती है। भाषिनी (राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन) जैसी परियोजनाओं में वास्तविक समय में वाक् पहचान और कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद के लिये 350 से अधिक AI मॉडल शामिल है

, जो शासन और डिजिटल बैंकिंग के लिये साक्षरता संबंधी बाधाओं को दूर करते हैं। वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों को कम करना: भू-राजनीतिक तनाव और उन्नत सेमीकंडक्टर चिप पर व्यापार प्रतिबंध किसी देश की तकनीकी प्रगति को तुरंत रोक सकते हैं, यदि उसमें घरेलू आपूर्ति शृंखला पर स्वायत्तता का अभाव हो। उदाहरण के लिये, अमेरिका द्वारा चीन को एनवीडिया के H200 चिप की बिक्री पर प्रतिबंध (जिसे बाद में हटा लिया गया)। सॉफ्टवेयर मॉडल के साथ-साथ स्वदेशी हार्डवेयर क्षमताओं का निर्माण करने से घरेलू विकास अंतर्राष्ट्रीय हार्डवेयर संबंधी बाधाओं से मुक्त हो जाता है। 76,000 करोड़ रुपये के इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के समर्थन से, स्वदेशी प्रोसेसर डिज़ाइन जैसे SHAKTI और VEGA के साथ-साथ कई फैब्रिकेशन तथा पैकेजिंग इकाइयाँ निर्माणाधीन हैं, जो संपूर्ण आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ कर रही हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य और कृषि का अतिस्तरीय विस्तार: घरेलू स्वास्थ्य अभिलेखों और कृषि आँकड़ों पर निर्मित विशेष संप्रभु मॉडल क्षेत्रीय बीमारियों का निदान कर सकते हैं या बड़े पैमाने पर मौसम संबंधी असामान्यताओं की भविष्यवाणी कर सकते हैं। सरकारी पहलों के तहत तैनात संप्रभु AI अनुप्रयोगों ने तपेदिक और मधुमेह रेटिनोपैथी जैसी स्थानीय बीमारियों का शीघ्र पता लगाने में औसत से अधिक सटीकता हासिल की है, साथ ही किसानों को वास्तविक समय की सलाह प्रदान करने में भी सहायता की है। गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारी निवेश आकर्षित करना: एक स्पष्ट राष्ट्रीय संप्रभु AI ढाँचा एक सशक्त बाज़ार संकेतक के रूप में कार्य करता है, जिससे निवेशकों का विश्वास सुदृढ़ होता है तथा घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र में पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहन मिलता है। उदाहरण के लिये, संरचित राष्ट्रीय रोडमैप और इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 जैसे आयोजनों से प्रेरित होकर, भारत में AI से जुड़े कुल निवेश दो साल के निवेश चक्र में 200 बिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है, जिसमें ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा ग्रिड तथा अनुप्रयोग स्तरों में पर्याप्त पूंजी का प्रवाह होगा। संप्रभु कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत के सामने आने वाली प्राथमिक बाधाएँ क्या हैं? कम उपयोग की गई कंप्यूट क्षमता और उच्च लागत: IndiaAI कंप्यूट पोर्टल पर 38,000 से

धिक GPU उपलब्ध होने के बावजूद, डेटा-सेंटर ऑपरेटरों और उद्योग रिपोर्टों में कहा गया है कि प्रारंभिक वित्तीय व्यय में से, पूंजी का केवल एक अंश ही छोटे उद्यमों के लिये सक्रिय, बाधारहित उपयोग परिवर्तित हो पाया है क्योंकि बुकिंग प्रक्रियाएँ अत्यधिक कागज़ी औपचारिकताओं में उलझी हुई हैं। कठोर पट्टा शर्तें— जैसे ‘मॉडल परिशोधन’ संबंधी कार्यभार के लिये केवल 7 दिनों की अल्प अवधि की सीमा और नवीनीकरण की अनिश्चित समय-सीमा, कंपनियों को राज्य द्वारा रियायती दर पर उपलब्ध कराई गई अवसंरचना के आधार पर दीर्घकालिक रणनीतियाँ बनाने से हतोत्साहित करती हैं। विदेशी सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता: विदेशी सिलिकॉन डिज़ाइन, एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट (ईयूवी) लिथोग्राफी और पैकेजिंग पर पूर्ण निर्भरता भारत को अंतर्राष्ट्रीय निर्यात नियंत्रणों, व्यापार युद्धों तथा आपूर्ति शृंखला में बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। भारत का सेमीकंडक्टर आयात अकेले वित्त वर्ष 2024 में 20 अरब डॉलर से अधिक हो गया और जबकि इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन स्थानीय पैकेजिंग को बढ़ा रहा है, वास्तविक फ्रंट-एंड एडवांस्ड नोड विनिर्माण (7nm से कम) अभी भी व्यावसायिक व्यवहार्यता से कई वर्ष दूर है, जिसमें मूलभूत प्रोसेसर परियोजनाएँ 2020 के दशक के अंत तक तैनाती की संभावनाओं को लक्षित कर रही हैं। डीप-टेक वेंचर कैपिटल फंडिंग गैप: संयुक्त राज्य अमेरिका या चीन के विपरीत, जहाँ वेंचर कैपिटल निवेशक नियमित रूप से अरबों डॉलर को अलाभकारी एवं उच्च जोखिम वाले मौलिक मॉडल अनुसंधान में निवेश करते हैं, भारत का जोखिम-पूंजी पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी अत्यधिक रूढ़िवादी बना हुआ है। शिखर सम्मेलनों में घोषित किये जाने वाले बड़े निवेशों की राशि भले ही सैकड़ों अरबों डॉलर तक पहुँच जाती है, लेकिन इस पूंजी का अधिकांश हिस्सा स्वदेशी मूलभूत मॉडल प्रशिक्षण के बजाय पारंपरिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर या विदेशी-संचालित हाइपरस्केल डेटा केंद्रों के लिये निर्धारित किया जाता है, जिसके लिये वर्षों तक घाटे में रहते हुए अनुसंधान एवं विकास कार्य करना आवश्यक होता है। अत्यधिक ऊर्जा और उन्नत शीतलन की कमी: आधुनिक AI सर्वर रैक के उच्च घनत्व वाले ताप उत्पादन के तहत मानक वायु-शीतलन प्रणालि

याँ विफल हो जाती हैं, जिसके लिये महँगी तरल या हाइब्रिड शीतलन प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जिनका विकासशील परिवेश में क्रियान्वयन महँगा होता है। डेटा सेंटर की क्षमता में कई गुना वृद्धि के साथ, बिजली की खपत में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे भारत के कुल विद्युत उत्पादन का एक बढ़ता हुआ हिस्सा इनकी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में व्यय होगा। इस मांग को पूरा करने के लिये ग्रिड का आधुनिकीकरण और अरबों डॉलर का निवेश करके नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण (जैसे पंप हाइड्रो और बैटरी) स्थापित करना आवश्यक है ताकि AI क्लस्टर 24/7 सुचारु रूप से चल सकें। भारत में डेटा सेंटर द्वारा जल की खपत वर्ष 2025 में 150 अरब लीटर से बढ़कर वर्ष 2030 तक 358 अरब लीटर होने की उम्मीद है, जो दोगुने से भी अधिक है, जिससे इसके जल स्तर पर और दबाव पड़ेगा। क्षेत्राधिकार संबंधी जाल और विदेशी क्लाउड का प्रभुत्व: भले ही डेटा भौतिक रूप से देश के भीतर स्थित हो, भारत की मौलिक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एवं कॉर्पोरेट क्लाउड पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी बड़े पैमाने पर विदेशी हाइपरस्केलर्स के अधीन संचालित होते हैं। US क्लाउड एक्ट, 2018 जैसे कानून अमेरिकी मुख्यालय वाले क्लाउड सेवा प्रदाताओं को अनुरोध किये जाने पर विदेशी क्षेत्र में संग्रहीत डेटा को उपलब्ध कराने हेतु कानूनी रूप से बाध्य करते हैं, जिससे स्थानीय डेटा सॉवरेनिटी संबंधी कानूनों की प्रभावशीलता कमज़ोर होती है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें विदेशी क्लाउड विक्रेताओं ने भू-राजनीतिक प्रतिबंधों में बदलाव के कारण अचानक पहुँच अवरुद्ध कर दी या संस्थाओं के लिये विशेष सॉफ्टवेयर इकाइयों को प्रतिबंधित कर दिया, जिससे महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना के लिये बाह्य क्लाउड बैकबोन पर निर्भरता की गंभीर संवेदनशीलता उजागर हुई है। खंडित और निम्न-गुणवत्ता वाले डोमेन डेटासेट: यद्यपि भारत विश्व के लगभग 20% डिजिटल डेटा का सृजन करता है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंरचित, बिना लेबल का या पुरानी तकनीकी प्रणालियों में अलग-अलग रूप से संग्रहीत है। इसके परिणामस्वरूप, स्थानीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकासकर्त्ता उन विशाल और सुव्यवस्थित मल्टी-मॉडल कॉर्पोरा की बराबरी करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं, जिनका उपयोग पश्च

मी देशों व चीन की अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशालाएँ करती हैं। सरकारी एवं निजी निधियों का एक बड़ा भाग हार्डवेयर की खरीद में निवेश किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप डेटा क्यूरेशन, डेटा क्लीनिंग तथा एनोटेशन फ्रेमवर्क के लिये पर्याप्त वित्तपोषण उपलब्ध नहीं हो पाता है। डीप-टेक और कोर फिजिक्स में विशिष्ट प्रतिभाओं का पलायन: भारत लाखों सामान्य सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को तैयार करता है, किंतु क्वांटम यांत्रिकी, हार्डवेयर उपकरण भौतिकी, उन्नत कंपाइलर डिज़ाइन तथा बड़े पैमाने पर क्लस्टर ऑर्केस्ट्रेशन जैसे अत्यधिक विशिष्ट क्षेत्रों में गंभीर प्रतिभा की कमी से जूझ रहा है। शीर्ष स्तर के शोधकर्त्ता अक्सर पश्चिमी शैक्षणिक संस्थानों या कॉर्पोरेट प्रयोगशालाओं (जैसे- ओपनAI, गूगल डीपमाइंड या मेटा) में चले जाते हैं, जहाँ वेतन और कंप्यूटिंग की उपलब्धता अत्याधुनिक अनुसंधान मांगों के अनुरूप होती है। भारत को अपनी AI सॉवरेनिटी को सुरक्षित करने के लिये कौन-से रणनीतिक कदम उठाने चाहिये? एक संप्रभु कृत्रिम डेटा उत्पादन ब्यूरो की स्थापना: निष्क्रिय डेटा संग्रहण से आगे बढ़ते हुए उन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिये सक्रिय एवं उच्च-सटीकता वाली अभियांत्रिकी को अपनाने की आवश्यकता है, जहाँ वास्तविक दुनिया के नमूने स्वाभाविक रूप से दुर्लभ हैं अथवा गोपनीयता कानूनों द्वारा प्रतिबंधित हैं। भौतिकी-आधारित न्यूरल नेटवर्क और उन्नत सिमुलेशन इंजनों का उपयोग करके उच्च-गुणवत्ता वाले, सांस्कृतिक रूप से सूक्ष्म प्रशिक्षण संग्रह तैयार करने के लिये पूरी तरह से समर्पित एक राष्ट्रीय सार्वजनिक-निजी संघ का गठन किया जाना चाहिये, जो घरेलू डेवलपर्स को समृद्ध, स्थानीयकृत संसाधन तुरंत उपलब्ध कराए। विकेंद्रीकृत अवसंरचना के लिये अग्रणी एज-नेटिव माइक्रो-मॉडल: विशाल शहरी क्लाउड डेटा केंद्रों से कम्प्यूटेशनल भार को सीधे उस फिज़िकल एज (Edge) पर स्थानांतरित किया जाना चाहिये, जहाँ नागरिक प्रौद्योगिकी के साथ प्रत्यक्ष रूप से अंतःक्रिया करते हैं। अति-निम्न-शक्ति मॉडल संपीड़न और एज-नेटिव आर्किटेक्चर की दिशा में प्रत्यक्ष राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास अनुदान आवश्यक है, जो अति-कुशल माइक्रो-मॉडल को सीधे कम लागत वाले कृषि सेंसर, ग्रा

ीण बिक्री केंद्र टर्मिनल और IoT उपकरणों में एम्बेड करता है ताकि तत्काल, ऑफलाइन स्थानीय प्रसंस्करण किया जा सके। राष्ट्रीय ओपन-वेट मॉडल रजिस्ट्री और रेड-टीमेंग ग्रिड की स्थापना: घरेलू AI आर्किटेक्चर के लिये एक एकीकृत, उच्च-सुरक्षा राष्ट्रीय सत्यापन मानक की ओर खंडित ओपन-सोर्स परिनियोजन से संक्रमण किया जाना चाहिये। एक केंद्रीकृत, राज्य-समर्थित सत्यापन ढाँचा स्थापित किया जाना चाहिये, जिसके अंतर्गत सभी स्वदेशी मॉडलों को महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोग की स्वीकृति प्रदान करने से पहले स्वचालित निरंतर ‘रेड-टीमिंग’ तथा क्षेत्रीय पक्षपात-न्यूनन संबंधी तनाव-परीक्षणों से गुजारा जाए। निष्क्रिय उद्यम परिसंपत्तियों के माध्यम से एक विकेंद्रीकृत कंप्यूट पूलिंग ग्रिड का निर्माण: एक सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड, वितरित कंप्यूट-शेयरिंग नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिये, जो कम उपयोग वाले समय में निजी विश्वविद्यालयों, कॉर्पोरेट सर्वर फार्मों और वित्तीय संस्थानों की निष्क्रिय GPU कंप्यूटिंग क्षमता को सुरक्षित रूप से एकत्रित करके एक विशाल, सहयोगात्मक सार्वजनिक सुपरकंप्यूटिंग स्तर का निर्माण कर सके। AI पाइपलाइनों में ज़ीरो-नॉलेज प्रूफ (ZKP) सत्यापन स्तरों का एकीकरण: संप्रभु नागरिक-केंद्रित एल्गोरिदम की संरचना में उन्नत क्रिप्टोग्राफिक-आधारित गोपनीयता सुरक्षा को सीधे समाहित किया जाना चाहिये। राज्य के AI वर्कफ्लो में ज़ीरो-नॉलेज क्रिप्टोग्राफी के उपयोग को अनिवार्य किया जाना चाहिये, जिससे मॉडल अंतर्निहित मूल डेटा को डिक्रिप्ट किये बिना या उजागर किये बिना पात्रता को प्रमाणित करने, निदान प्रक्रिया करने और अनुपालन को सत्यापित करने में सक्षम हो सकें। स्वायत्त बहुभाषी कोड जनरेशन कंपाइलर विकसित करना: विरासत में मिले सार्वजनिक क्षेत्र के सॉफ्टवेयर स्टैक पर विशेष रूप से प्रशिक्षित विशेष संप्रभु कोड सहायकों को तैनात किया जाना चाहिये, जिससे डेवलपर्स को क्षेत्रीय भाषा के संकेतों का उपयोग करके सरकारी डिजिटल अवसंरचना का स्वचालित रूप से अनुवाद, अनुकूलन एवं अनुरक्षण करने की शक्ति मिलती है। राष्ट्रीय डीप-टेक संप्रभु पुनर्बीमा कोष का शुभारंभ: डीप-टेक नवप्रवर्तकों के लिये राज्य समर्थित वित्तीय शॉ

एब्जॉर्बर बनाकर घरेलू संस्थागत निवेशकों से दीर्घकालिक जोखिम पूंजी को अनलॉक किया जाना चाहिये। एक संप्रभु प्रथम-हानि गारंटी और पुनर्बीमा व्यवस्था स्थापित किये जाने चाहिये जो मूलभूत हार्डवेयर और AI स्टार्टअप्स के लिये प्रारंभिक चरण की विफलता के जोखिम के एक निश्चित प्रतिशत को अवशोषित करे तथा साथ ही घरेलू पेंशन एवं म्यूचुअल फंड पूंजी को इस क्षेत्र में सहजता से आकर्षित करे। न्यूरोमॉर्फिक और बायोमिमेटिक हार्डवेयर कंसोर्टिया को वित्तपोषण: नेक्स्ट जेनरेशन के मस्तिष्क-प्रेरित इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में निवेश करके पारंपरिक ऊर्जा-खपत वाले कंप्यूटिंग आर्किटेक्चर से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। न्यूरोमॉर्फिक चिप डिज़ाइन पर केंद्रित समर्पित अनुसंधान संघों की स्थापना की जानी चाहिये, जो इवेंट-ड्रिवन एवं मस्तिष्क-प्रेरित हार्डवेयर का विकास करें, जो पारंपरिक सिलिकॉन क्लस्टर द्वारा आवश्यक ऊर्जा के केवल एक अंश का उपयोग करते हुए जटिल AI वर्कलोड को निष्पादित करने में सक्षम हों।