नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच संबंधों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज़ हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या आरएसएस अपनी सबसे सफल राजनीतिक रचना — भाजपा — पर नियंत्रण बनाए रख पाएगा या धीरे-धीरे उसका प्रभाव कम हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा के बढ़ते संगठनात्मक विस्तार और नेतृत्व की स्वतंत्र शैली ने आरएसएस की पारंपरिक भूमिका को चुनौती दी है। पार्टी के भीतर कई निर्णय अब सीधे राजनीतिक नेतृत्व द्वारा लिए जा रहे हैं, जबकि पहले आरएसएस की राय को अहमियत दी जाती थी। हाल के वर्षों में भाजपा ने चुनावी रणनीति, संगठनात्मक नियुक्तियों और नीतिगत फैसलों में आरएसएस की सलाह से अलग रास्ता अपनाया है। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या भाजपा अब पूरी तरह एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई बन चुकी है।